Thursday, April 3, 2025
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बीएचयू में दलित प्रोफेसर से भयंकर जातिवाद, सड़क पर उतरे बहुजन छात्र

महेश अहिरवार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर हैं। विभागाध्यक्ष का पद खाली हुआ तो नियम के अनुसार वरिष्ठता के हिसाब से प्रोफेसर महेश अहिरवार को विभाग का अध्यक्ष चुना जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है।

वाराणसी। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पीएचडी में दाखिले को लेकर शिवम सोनकर अभी धरने पर बैठे ही थे कि विश्वविद्यालय में जातिवाद का नया मामला सामने आ गया है। खबर है कि दलित समाज से ताल्लुक रखने वाले सीनियर प्रोफेसर को अंगूठा दिखाते हुए उनसे दो साल जूनियर ब्राह्मण जाति के प्रोफेसर को विभाग का अध्यक्ष बना दिया गया है। इसके बाद दलित समाज के प्रोफेसर के समर्थन में छात्रों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

महेश अहिरवार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर हैं। विभागाध्यक्ष का पद खाली हुआ तो विश्वविद्यालय द्वारा ही बनाए नियम 25 (4) के अनुसार वरिष्ठता के हिसाब से प्रोफेसर महेश अहिरवार को विभाग का अध्यक्ष चुना जाना चाहिए था। लेकिन युनिवर्सिटी ने अपने ही बनाए नियमों को धत्ता बताते हुए उनसे दो साल जूनियर ब्राह्मण जाति के प्रोफेसर को विभाग का अध्यक्ष बनाने की कोशिश शुरू कर दी। इससे विश्वविद्यालय में हंगामा शुरू हो गया।

प्रोफेसर महेश अहिरवार और विभाग के तमाम छात्र विश्वविद्यालय प्रशासन पर जातिवाद का आरोप लगा रहें हैं तो दूसरी ओर विश्वविद्यालय आंखें मूंदे है। बता दें कि यह तब है जब प्रोफेसर अहिरवार बीएचयू में 29 साल की सेवा कर चुके हैं।

इस घटना को लेकर बीएचयू में पढ़ने वाले बहुजन छात्रों के संगठन ने बीएचयू प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ओबीसी, एससी, एसटी, अल्पसंख्यक संघर्ष समिति ने एक पत्र लिखकर प्रोफेसर सोनकर के साथ जातिवाद का आरोप लगाते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन पर सवाल उठाया है। अपनी पत्र में संगठन ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि-

बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में विश्वविद्यालय के नियम [Statute 25 (4) (2)] के अनुसार वरिष्ठता क्रम में विभागाध्यक्ष के रूप में प्रोफेसर महेश प्रसाद अहिरवार की नियुक्ति किया जाना था किंतु अनुसूचित जाति समुदाय का होने के कारण उन्हें विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्ति से वंचित कर दिया गया।

प्रो अहिरवार की शिक्षक के रूप में 29 साल की सेवा और प्रोफेसर के पद पर 14 साल गुजारने के बावजूद उन्हें उनके विधिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। यह पूरा षड्यंत्र रजिस्टर महोदय अपनी सीनियारिटी बढ़ाने के चक्कर में कर रहे हैं ताकि वह रजिस्टर पद से हटने के बाद महिला महाविद्यालय का प्रिंसिपल बन सकें जबकि सीनियर प्रोफेसर के रूप में उनकी नियुक्ति खुद अधर में लटकी है तथा विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी द्वारा अभी तक अनुमोदन नहीं है। यह पूरी तरह स्पष्ट है कि रजिस्ट्रार महोदय द्वारा अपनी तथाकथित सीनियर प्रोफेसर की सीनियरिटी बढ़ाने तथा अपने गिने-चुने घनिष्ठ मित्रों को इसका अनुचित लाभ दिलाने के लिए सुनियोजित योजना बनाई गई है और प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में विभागाध्यक्ष की नियुक्ति को विवादित बनाया गया है। यह रजिस्ट्रार की कुत्सित और घोर जातिवादी मानसिकता का परिचायक है।

इस साजिश का पता चलने पर प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार ने जब रेक्टर महोदय के यहां अपनी लिखित आपत्ति दर्ज कराई तो कला संकाय प्रमुख को आगामी आदेश तक के लिए विभागाध्यक्ष बना दिया गया जो पूरी तरह नियमों की अनदेखी है क्योंकि विश्वविद्यालय के नियम (Statute) 25(4) 2 में रोटेशन के आधार पर (बारी-बारी से) वरिष्ठता के क्रम में प्रोफेसर्स को विभागाध्यक्ष बनाने का प्रावधान है न कि संकाय प्रमुख को। इसी तरह की अनियमिताओं और नियम कानूनों की अवहेलना के कारण पिछले तीन सालों में 400 से अधिक मुकदमे विश्वविद्यालय के खिलाफ हाईकोर्ट में दर्ज किए गए हैं जिसमें विश्वविद्यालय प्रशासन मात्र एक साल में ही जनता की गाढ़ी कमाई का एक करोड रुपए से अधिक खर्च कर रहा है।
अतः हम विश्वविद्यालय प्रशासन से हमारी मांग है कि प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में विभाग अध्यक्ष की नियुक्ति विश्वविद्यालय के नियम(Statue) 25(4)2 का अनुपालन करते हुए प्रोफेसर महेश प्रसाद अहिरवार की नियुक्ति विभाग अध्यक्ष के रूप में की जाए ठीक उसी तरह जिस प्रकार दर्शनशास्त्र विभाग, शारीरिक शिक्षा विभाग, पाली विभाग तथा विश्वविद्यालय के अन्य विभागों में विभाग अध्यक्षों की नियुक्ति हाल के दिनों में की गई है।

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