Friday, April 4, 2025
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शिवाजी को दुनिया के सामने ज्योतिबाराव फुले लेकर आए थे

वंचित तबके को सशक्त बनाने में अहम किरदार निभाने वाले राष्ट्रपति ज्योतिबा फुले की आज 193वीं जयंती है। महान समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक और क्रांतिकारी जोतिबा राव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में हुआ था। वही पुणे जो पेशवाई का गढ़ रहा है। और जहां के बारे में कुख्यात है कि यहां दलितों को कमर में झाड़ू और गले में मटका लटका कर चलना पड़ता था।

महामना फुले माली समाज से थे। महिलाओं की शिक्षा के लिए उनका योगदान उल्लेखनीय है। ब्राह्मणों और पुरोहितों की व्यवस्था का उन्होंने खुल कर विरोध किया और बिना उनके विवाह-संस्कार शुरु करवाया। और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। आज यह आंदोलन जोर पकड़ चुका है। वह संभवतः भारत के पहले समाजसेवक हैं, जिन्होंने बाल-विवाह का विरोध किया और विधवा-विवाह का समर्थन किया।

वह अछूत समझे जाने वाले दलित वर्ग की स्वतंत्रता और समानता के प्रबल समर्थक थे। जब लोग दलितों की परछाई से कतराते थे, जोतिबा फुले ने अपने घर का पानी उनके लिए खोल दिया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया और बाद में ब्राह्मणों के दबाव में पिता ने घर से निकल जाने को कहा।

उन्होंने समाज के दबे-कुचले वर्ग के लिए ब्रिटिश शासन से भी टकराने  से गुरेज नहीं किया।  इस खबर में हम आपको उनके ब्रिटिश शासन से भिड़ने के दो किस्से सुनाएंगे, साथ ही शिवाजी महाराज से जुड़ा एक और किस्सा जिसे समाज का बड़ा वर्ग नहीं जानता। लोग आज शिवाजी की विरासत पर दावा तो करते हैं लेकिन बहुतों को यह पता नहीं है कि शिवाजी को दुनिया के सामने लाने वाले ज्योतिबाराव फुले ही थे। लेकिन शिवाजी महाराज के किस्से से पहले दो और घटनाएं जो यह बताती है कि ज्योतिबा फुले का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही देश की व्यवस्था को बेहतर बनाने में कितना बड़ा योगदान था।

एक किस्सा 1876 से 1880 तक भारत के वायसराय रहे लॉर्ड लिटन से जुड़ा है। 1878 में उसने वर्नाक्युलर ऐक्ट पास करके प्रेस की आजादी पर खत्म करने की कोशिश की। इस कानून के तहत देसी भाषा में छपने वाले समाचारपत्रों पर कुछ रोक लगा दी गई। तब ज्योतिबा फुले के संगठन सत्यशोधक समाज के जरिए दीनबंधु समाचार पत्र निकलता था। इसके जरिए प्रेस की आजादी छीनने के प्रतिबंध का काफी विरोध किया गया। इस प्रतिबंध के 2 साल बाद 1880 में लिटन को पूना आना था। पूना नगरपालिका का तत्कालीन अध्यक्ष लॉर्ड लिटन का भव्य स्वागत करना चाहता था।

ज्योतिबा फुले नगरपालिका के सदस्य थे। वह इससे असहमत थे कि टैक्सपेयर्स का पैसा लिटन जैसे आजादी के विरोधी व्यक्ति पर खर्च किया जाए। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि लिटन की बजाय उस पैसे को पूना के गरीब लोगों की शिक्षा पर खर्च किया जाए। पूना नगरपालिका में उस समय 32 नामित सदस्य थे जिनमें से अकेले ज्योतिबा फुले थे उस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया।

एक और ऐसा मौका आया था जब ब्रिटिश राजकुमार के सामने गरीब किसानों की आवाज उठा कर सबको हैरत में डाल दिया। ज्योतिबा फुले के एक दोस्त थे जिनका नाम हरि रावजी चिपलुनकर था। उन्होंने महारानी विक्टोरिया के पोते ब्रिटिश राजकुमार और उसकी पत्नी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। उस कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले को भी जाना था। उस भव्य आयोजन में जहां तमाम लोग हीरे-मोती के गहने और शानदार वस्त्र पहन कर गए थे, ज्योतिबा फुले कार्यक्रम में किसानों जैसा कपड़ा पहनकर गए। इस पर सभी लोगों की नजर उनकी ओर टिक गई। तब ज्योतिबा फुले ने राजकुमार से कहा कि अगर राजकुमार वाकई में इंग्लैंड की महारानी की भारतीय प्रजा की स्थिति जानना चाहता है तो वह आसपास के गांवों का दौरा करे। उन्होंने राजकुमार को अछूतों के बीच भी जाने का सुझाव दिया। ताकि राजकुमार उनकी दयनीय स्थिति को समझ सकें। उन्होंने राजकुमार से आग्रह किया कि वह उनके संदेश को महारानी विक्टोरिया तक पहुंचा दे और गरीब लोगों को उचित शिक्षा मुहैया कराने का बंदोबस्त करे। ज्योतिबा फुले के इस भाषण से समारोह में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए थे।

अब आते हैं शिवाजी महाराज से जुड़े किस्से पर। आज पूरे महाराष्ट्र की राजनीति, छत्रपति शिवाजी महाराज के इर्द-गिर्द घूमती हैं। लेकिन इस बात की जानकारी बहुत कम ही लोगों को है कि पेशवाओं ने उनके इतिहास को पूरी तरह दफन कर दिया था। उन्हें दोबारा महाराष्ट्र में स्थापित करने का श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा जोतीराव फुले को ही जाता है।

धनंजय कीर द्वारा महात्मा जोतीराव फुले की लिखी जीवनी “महात्मा जोतीराव फुले, भारत की सामाजिक क्रांति के पितामह” में इसका वर्णन साफ मिलता है।  इसमें उन्होंने लिखा है- फुले ने छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रायगढ़ का बड़े ही आदर और उत्सुकता से दौरा किया। वो जोतीराव ही थे, जिन्होंने पहली बार छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधी को खोजा था, जो कि सूखे पत्तों और पत्थरों से ढकी पड़ी थी। उन्होंने शिवाजी पर एक गाथा भी लिखी और जून 1869 को प्रकाशित की। उस गाथा का शीर्षक था, “शिवाजी महाराज का जीवन काव्य गीत में।”

आज महाराष्ट्र के तमाम राजनीतिक दल शिवाजी की विरासत पर दावा करते हैं, लेकिन तमाम नेता इस इतिहास का जिक्र करने से कतराते हैं। लेकिन बाबासाहेब आंबेडकर ज्योतिबा फुले की महानता और समाजिक कामों से काफी प्रभावित थे। यही वजह रही कि उन्होंने ज्योतिबा फुले को अपना गुरु माना।

मनुवादी मीडिया और भारत के जातिवादी समाज ने हमेशा से ज्योतिबा फुले की महानता और उनको कामों की अनदेखी की है। लेकिन भारत का बहुजन समाज देश के इस महान क्रांतिकारी और समाजसेवक को राष्ट्रपिता कह कर संबोधित और सम्मानित करता है।

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