मेरे जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी,
न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।
27 अप्रैल, 2012 को संसद में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये शेर पढ़ा था. उन दिनों यूपीए सरकार हर मोर्चे पर फेल हो रही थी. घोटाले पर घोटाले उजागर हो रहे थे, विपक्ष मनमोहन सिंह को बार-बार बोलने के लिए उकसा रहा था, उनकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे, उन्हें ‘मौन’मोहन सिंह का खिताब दिया जा रहा था. फिर भी इस सरदार की चुप्पी नहीं टूटी. जब टूटी तो वही शेर पढ़ा, जो मैंने ऊपर लिखा है.
मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री रहे. देश के सबसे ताकतवर पद पर रहे, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा बदनाम भी हुए. एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिनकी खामोशी को विपक्ष ने चुनावों में मुद्दा तक बना लिया. पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके बताना पड़ा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कितनी बार चुप्पी तोड़ी है.
मनमोहन सिंह न तो कभी राजनीति में रहे और न ही राजनीति से उनका कोई खास लेना-देना रहा. हालात की मजबूरियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया तो मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा उनके नाम के आगे से बीजेपी ने कभी हटने नहीं दिया.
दस साल की सत्ता में मनमोहन सिंह ने बहुत कुछ देखा. देश को विकास की राह पर चलते देखा तो अपनी ही सरकार को भ्रष्टाचार की गर्त में जाते देखा. कॉमनवेल्थ गेम में करोड़ों का वारा न्यारा करने वाला कलमाड़ी देखा तो किसी राजा का अरबों का टूजी घोटाला देखा. ‘कोयले’ की कालिख ने तो मनमोहन सिंह का भी दामन मैला कर दिया.
तो क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में मनमोहन सिंह को सबसे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर आंका जाएगा?
क्या सबसे भ्रष्टाचारी सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे?
क्या रिमोट कंट्रोल से चलने प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास याद करेगा मनमोहन सिंह को?
ये सवाल मनमोहन सिंह को भी भीतर से चाल रहे थे. तभी तो सत्ता के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा था-मुझे उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा.
मनमोहन में काबीलियत की कमी नहीं थी. उनकी ईमानदारी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा. उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल नहीं उठा. मनमोहन सिंह, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, चंद्रशेखर ने जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना वित्तीय सलाहकार बनाया. राजीव गांधी ने जिन्हें प्लानिंग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया, नरसिंह राव ने जिन्हें बुलाकर देश का वित्तमंत्री बनाया था.
दरअसल नरसिंह राव कुशल कप्तान थे, मनमोहन सिंह उनकी टीम के ‘सचिन तेंदुलकर थे’. वो 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने थे. तब अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी. देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी. महंगाई चरम सीमा पर थी. मनमोहन ने जब आर्थिक सुधारों की छड़ी घुमाई तो कायापलट होने लगा. विपक्ष मनमोहन पर सवालों की बारिश कर रहा था, लेकिन मनमोहन के सिर पर छतरी ताने नरसिंह राव खड़े थे. मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया था. जिस तरह से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खोल रहे हैं. नतीजा ये हुआ कि आर्थिक सुधार रंग लाने लगे. देश का गिरवी रखा सोना भी वापस आया. अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटी. 1991-92 में जो जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 1.3 थी, वो 1992-93 में 5.1 और 1994-95 तक 7.3 हो गई. उदारीकरण के चलते इन्फार्मेशन टेक्लनोलॉजी और टेलिकॉम सेक्टर में क्रांति हुई और उन दिनों इस क्षेत्र में करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला. ये मनमोहन सिंह की बतौर खिलाड़ी जीत थी तो उससे बड़ी जीत नरसिंह राव की कप्तानी की भी थी.
2004 में मनमोहन सिंह जब खुद कप्तान (प्रधानमंत्री) बने तो पहले पांच साल उनकी सरकार बड़े मजे में चली. कई मोर्चे फतेह किए, सड़कें बनीं, अर्थव्यवस्था को पंख लगे, जीडीपी ग्रोथ 8.1 तक पहुंची. मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार देकर जनता के हाथों में एक बहुत बड़ी ताकत थमाई. लालकृष्ण आडवाणी शेरवानी पहने खड़े रह गए, 2009 में देश की जनता ने फिर मनमोहन को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया. ये मनमोहन सिंह के काम का इनाम था. लेकिन दूसरी पारी में मनमोहन न खुद संभल पाए और न सरकार संभाल पाए. बस रिमोट कंट्रोल पीएम बनकर रह गए.
यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने जितना कमाया था, यूपीए-2 में सब गंवा दिया. घोटालों की झड़ी लग गई, महंगाई आसमान छूने लगी. पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों के सिर तक काट ले गए. चीन भारत की सीमा में कई बार घुस आया. मनमोहन सिंह की कई बार कांग्रेस के भीतर भी बेइज्जती हुई, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बाकायदा पद पर बने रहकर वफादारी की कीमत चुकाई. तमाम आरोपों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, वे खामोश रहे. ये मनमोहन सिंह की चुप्पी नहीं थी, वे चुपचाप सत्ता का ‘विष’ पी रहे थे. जुबान खोलते तो उनके ही आसपास के कई खद्दरधारी जेल में होते, चुप रहे, बहुतों की इज्जत बचा ली.
मनमोहन सिंह बद नहीं थे, लेकिन बदनाम ज्यादा हो गए. मनमोहन सिंह की जिंदगी नाकामियों और कामयाबियों की दास्तानों से भरी पड़ी है. इतिहास भी उन पर फैसला करने में हमेशा कश्मकश में रहेगा. उनकी आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उनके साथ बेईमानी होगी.
– यह लेख विकास मिश्रा ने लिखा है. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हैं.
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