महाबोधि मुक्ति आंदोलन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर चुप्पी साधे रखना उन लोगों की दोहरी मानसिकता को उजागर करता है, जो केवल अवसरवादिता के आधार पर बौद्ध धर्म का नाम लेते हैं। नरेंद्र मोदी, जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को बुद्ध की भूमि कहकर गौरव महसूस करते हैं, लेकिन जब बोधगया के मूल अधिकारों की बात आती है, तो मौन साध लेते हैं। रामदास अठावले, जो दलित-बौद्ध राजनीति के नाम पर सत्ता का सुख भोगते हैं, लेकिन इस आंदोलन पर उनकी आवाज सुनाई नहीं देती।
किरेन रिजिजू, जो पूर्वोत्तर के बौद्ध समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इस विषय पर पूरी तरह उदासीन बने हुए हैं। दिलीप मंडल, जो सोशल मीडिया पर बौद्ध विमर्श के बड़े पैरोकार बने फिरते हैं, इस वास्तविक मुद्दे पर कहीं नजर नहीं आते।
दरअसल, ये सभी लोग आरएसएस की मनुवादी मानसिकता से ग्रसित हैं, जिनका बौद्ध धर्म और उसके मूल सिद्धांतों से कोई सरोकार नहीं है। इनका असली उद्देश्य बहुजनों और बौद्ध समाज को छलना और अपने राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करना है। संघ और उसकी विचारधारा से जुड़े ये लोग बुद्ध के विचारों के खिलाफ खड़े हैं और बोधगया जैसे पवित्र स्थल को संरक्षित करने की जिम्मेदारी से पीछे हट रहे हैं। इनकी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि ये केवल अपने निजी स्वार्थों और राजनीतिक एजेंडे के लिए बुद्ध का नाम लेते हैं, न कि बौद्ध धर्म और उसके पवित्र स्थलों की रक्षा के लिए।
सोशल एक्टिविस्ट हंसराज मीणा के एक्स पोस्ट से साभार प्रकाशित

हंसराज मीणा एक सामाजिक-राजनीतिक एक्टिविस्ट हैं, जो वंचित समाज से जुड़े मानवाधिकार के मुद्दों पर काफी मुखर रहते हैं। वह ट्राईबल आर्मी के संस्थापक भी हैं।